तुर्की कौड़ियों के भाव बेच रहा था S-400... फिर भी भारत ने नहीं खरीदा! आखिर क्या है इसके पीछे का बड़ा राज?
रूस के अत्याधुनिक S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। खबरें हैं कि तुर्की, जिसने कुछ वर्ष पहले रूस से S-400 खरीदा था, अब उसे अपने बेड़े से हटाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में आई खटास और पांचवीं पीढ़ी के F-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में दोबारा शामिल होने की उसकी कोशिश मानी जा रही है।
इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद एक बड़ा सवाल उठने लगा है कि जब भारत पहले से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम का उपयोग कर रहा है और भविष्य में अतिरिक्त स्क्वाड्रन लेने की योजना भी बना चुका है, तो क्या उसे तुर्की के इस्तेमाल किए गए S-400 सिस्टम खरीदने पर विचार करना चाहिए था?
हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका जवाब इतना आसान नहीं है। इसके पीछे तकनीकी, सामरिक और परिचालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कारण हैं। यह भी ध्यान देना जरूरी है कि तुर्की द्वारा S-400 बेचने और संभावित खरीदारों से जुड़ी कई रिपोर्टों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है।
क्या है पूरा मामला?
तुर्की ने वर्ष 2017 में रूस के साथ S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने का समझौता किया था। इस सौदे के बाद अमेरिका ने कड़ा विरोध जताया और कहा कि नाटो (NATO) का सदस्य होने के बावजूद तुर्की द्वारा रूस का अत्याधुनिक रक्षा सिस्टम खरीदना सुरक्षा हितों के खिलाफ है।
इसके बाद अमेरिका ने CAATSA (Countering America's Adversaries Through Sanctions Act) के तहत तुर्की पर प्रतिबंध लगाए और उसे F-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम से बाहर कर दिया।
इसके अलावा अमेरिका ने तुर्की के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान KAAN के लिए आवश्यक GE F110 इंजन की आपूर्ति पर भी रोक लगा दी।
विश्लेषकों का मानना है कि अब तुर्की अमेरिका के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है और इसी वजह से S-400 को अपने सैन्य बेड़े से हटाने की संभावना पर चर्चा हो रही है।
क्यों खास है S-400 एयर डिफेंस सिस्टम?
रूस का S-400 'ट्रायम्फ' दुनिया के सबसे उन्नत लंबी दूरी के वायु रक्षा प्रणालियों में गिना जाता है।
यह प्रणाली एक साथ कई प्रकार के हवाई लक्ष्यों पर नजर रख सकती है और लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल तथा बैलिस्टिक मिसाइलों को निशाना बनाने की क्षमता रखती है।
इसी कारण कई देशों ने इसमें रुचि दिखाई है।
भारत भी इसे अपनी बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बना चुका है।
भारत के पास कितने S-400 हैं?
भारत ने रूस के साथ पांच S-400 स्क्वाड्रन खरीदने का समझौता किया था।
अब तक चार स्क्वाड्रन भारत को मिल चुके हैं, जबकि पांचवें स्क्वाड्रन की आपूर्ति पूरी होने की उम्मीद जताई जाती रही है।
इन प्रणालियों को भारत के विभिन्न रणनीतिक क्षेत्रों में तैनात किया गया है, जहां वे देश की हवाई सुरक्षा को मजबूत कर रही हैं।
इसके अलावा भारत भविष्य में अतिरिक्त एयर डिफेंस क्षमता विकसित करने पर भी काम कर रहा है।
फिर भारत तुर्की वाला सिस्टम क्यों नहीं खरीद सकता?
पहली नजर में यह विचार आकर्षक लग सकता है कि यदि तुर्की अपने इस्तेमाल किए गए S-400 कम कीमत पर बेच रहा है, तो भारत उन्हें खरीदकर अपनी क्षमता बढ़ा सकता है।
लेकिन रक्षा मामलों के जानकार बताते हैं कि वास्तविकता इससे काफी अलग है।
भारत का S-400 अलग संस्करण है
भारत को रूस ने जो S-400 उपलब्ध कराया है, उसे सामान्य निर्यात (Export Version) से अलग और भारत की जरूरतों के अनुरूप तैयार किया गया बताया जाता है।
रिपोर्टों के अनुसार भारतीय संस्करण में कई ऐसे तकनीकी बदलाव किए गए हैं, जो उसे भारतीय वायु रक्षा नेटवर्क के साथ बेहतर तरीके से जोड़ते हैं।
दूसरी ओर तुर्की के पास मौजूद प्रणाली मानक निर्यात संस्करण मानी जाती है।
ऐसे में दोनों प्रणालियों की तकनीकी संरचना और एकीकरण (Integration) समान नहीं हैं।
भारतीय एयर डिफेंस नेटवर्क से जुड़ाव
भारत अपनी वायु रक्षा प्रणाली को एकीकृत कमांड और कंट्रोल नेटवर्क के तहत संचालित करता है।
इस नेटवर्क में रडार, मिसाइल प्रणाली, लड़ाकू विमान और कमांड सेंटर लगातार एक-दूसरे से सूचनाओं का आदान-प्रदान करते रहते हैं।
यदि किसी अन्य देश का अलग कॉन्फ़िगरेशन वाला S-400 खरीदा जाए, तो उसे इस पूरे नेटवर्क में शामिल करना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यही कारण है कि केवल सिस्टम खरीद लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका देश की मौजूदा सैन्य संरचना से पूरी तरह मेल खाना भी जरूरी होता है।
इस्तेमाल किए गए रक्षा उपकरण खरीदने की चुनौती
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सेकेंड-हैंड सैन्य उपकरण खरीदने में कई जोखिम होते हैं।
सबसे पहले उनकी सर्विस हिस्ट्री, रखरखाव और वास्तविक तकनीकी स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करना पड़ता है।
यदि किसी सिस्टम का रखरखाव अलग तरीके से हुआ हो या उसके पुर्जों का जीवनकाल कम बचा हो, तो उसे संचालित करने की लागत बढ़ सकती है।
इसके अलावा अलग कॉन्फ़िगरेशन वाले उपकरणों के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
मिसाइलों में भी हो सकता है अंतर
रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि विभिन्न देशों को दिए गए S-400 सिस्टम में उपयोग होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों की क्षमता और रेंज अलग-अलग हो सकती है।
हालांकि भारत और रूस ने भारतीय S-400 की विस्तृत तकनीकी क्षमताओं को सार्वजनिक नहीं किया है।
इसी वजह से किसी भी तुलना को लेकर आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुसार अलग-अलग कॉन्फ़िगरेशन का चयन कर सकता है।
भारत की भविष्य की रणनीति
भारत केवल विदेशी रक्षा प्रणालियों पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
देश समानांतर रूप से स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली विकसित करने की दिशा में भी काम कर रहा है।
'कुश' (Kusha) जैसी परियोजनाओं को भविष्य में भारतीय एयर डिफेंस नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
इसके साथ-साथ भारत अपनी मौजूदा S-400 क्षमता का भी विस्तार करने की संभावनाओं पर विचार करता रहा है।
अमेरिका-तुर्की विवाद का क्या असर?
तुर्की और अमेरिका के बीच S-400 को लेकर विवाद पिछले कई वर्षों से जारी है।
अमेरिका का तर्क रहा है कि रूसी रक्षा प्रणाली का उपयोग NATO के सुरक्षा ढांचे के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
दूसरी ओर तुर्की लंबे समय तक अपने फैसले का बचाव करता रहा।
अब यदि तुर्की वास्तव में इस प्रणाली को हटाने का निर्णय लेता है, तो इसे दोनों देशों के संबंध सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय और आधिकारिक घोषणा का इंतजार रहेगा।
तुर्की द्वारा S-400 प्रणाली को हटाने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय रक्षा जगत में नई चर्चा छेड़ दी है। लेकिन भारत के लिए तुर्की का इस्तेमाल किया गया S-400 खरीदना उतना सरल विकल्प नहीं माना जा रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह तकनीकी कॉन्फ़िगरेशन, भारतीय वायु रक्षा नेटवर्क के साथ अनुकूलता, रखरखाव संबंधी चुनौतियां और सामरिक आवश्यकताएं हैं।
रक्षा मामलों में केवल कम कीमत या उपलब्धता ही निर्णय का आधार नहीं होती, बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा, तकनीकी एकीकरण और परिचालन क्षमता सबसे महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि भारत फिलहाल अपने विशेष कॉन्फ़िगरेशन वाले S-400 और स्वदेशी एयर डिफेंस परियोजनाओं पर अधिक ध्यान देता दिखाई देता है।

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